Martyrs day| भगत सिंह |शहीद दिवस
"शहीद-ए-आज़म" भगत सिंह स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे सच्चे सिपाही रहे हैं, जिनका जिक्र आते ही शरीर में देशभक्ति के जोश से रोंगटे खड़े होने लगते हैं।वैसे तो देश की आजादी की लड़ाई में कई स्वतंत्रता सेनानी हुए, लेकिन इनमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु तीन ऐसे क्रांतिकारी थे जिनके विचार और व्यक्तित्व आज भी युवाओं को प्रेरणा देते हैं। आज इनकी कुर्बानी को याद करने का दिन है।
23 मार्च ही वो दिन था जब ये तीनों हंसते-हंसते देश के लिए फांसी के फंदे पर झूल गए। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने 1928 में लाहौर में एक ब्रिटिश जूनियर पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी थी जिसे लाहौर षड्यंत्र केस के नाम से भी जाना जाता है। इसके लिए तीनों को फांसी की सजा सुनाई थी। तीनों को 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल के भीतर ही फांसी दे दी गई। इस मामले में सुखदेव को भी दोषी माना गया था। सजा की तारीख 24 मार्च थी, लेकिन 1 दिन पहले ही फांसी दे गई थी। भारत ने इस दिन अपने तीन वीर सपूत को खोया था। उनकी शहादत की याद में हर साल 23 मार्च का दिन शहीदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है।
भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था. यह जिला अब पाकिस्तान है. उनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था. 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह के बाल मन पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला था.
12 साल की उम्र में शहीदे आजम भगत सिंह आजादी के आंदोलन में कूद पड़े थे। भगत सिंह अपने साहसी कारनामों के कारण युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए थे। उन्होंने ही इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया। उन्होंने अपने छोटे से जीवन में वैचारिक क्रांति की जो मशाल जलाई, वह आज भी जिंदा है।
फांसी के पहले 3 मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था -
भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था. यह जिला अब पाकिस्तान है. उनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था. 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह के बाल मन पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला था.
12 साल की उम्र में शहीदे आजम भगत सिंह आजादी के आंदोलन में कूद पड़े थे। भगत सिंह अपने साहसी कारनामों के कारण युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए थे। उन्होंने ही इंकलाब जिंदाबाद का नारा दिया। उन्होंने अपने छोटे से जीवन में वैचारिक क्रांति की जो मशाल जलाई, वह आज भी जिंदा है।
फांसी के पहले 3 मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था -
उन्हें यह फिक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है?
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें।
सारा जहाँ अदू सही, आओ! मुक़ाबला करें।।
इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चन्द्रशेखर आजाद से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खाई थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखाई।
भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव भारत मां के वे सच्चे सपूत थे, जिन्होंने अपनी देशभक्ति और देशप्रेम को अपने प्राणों से भी अधिक महत्व दिया और मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर कर गए। 23 मार्च शहीद दिवस पर पूरा देश इन वीरों के बलिदान को भीगे मन से श्रद्धांजलि देता है।
शहीद दिवस पर 10 प्रश्नों की एक प्रश्नोत्तरी आयोजित की जा रही है। यह प्रश्न विद्यार्थियों के सामान्य ज्ञान को बढ़ाने में एवं विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा में सहायक सिद्ध होंगी।
आप सभी को शहीद दिवस पर दी गयी जानकारी कैसी लगी अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर व्यक्त करें।
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